Monday, August 3, 2026

घर, जो उसने चुपचाप सँवारा — एक कविता, उसके नाम

 




                              घर बदला, दीवारें नई हैं,

पर उसकी थकान वही पुरानी सी है,

सुबह की चाय अब ठंडी होती है,

बच्चों की हँसी में घुल जाती है।

 

शिवेश की ज़िद, अभ्यांत की मुस्कान,

दोनों के बीच बँटा उसका ध्यान,

हर पन्ने पर एक नया सवाल,

हर जवाब में उसका आधा वक़्त कटा।

 

रसोई में कभी वो जादूगर थी,

हर मसाले की उसे पहचान थी,

वो नुस्खे जो कभी वो ढूंढा करती थी,

अब मोबाइल में सेव पड़े रहते हैं।

 

कमर का दर्द, पैरों की अकड़न,

पर चेहरे पे कभी शिकन नहीं आने दी,

हँसती है वो ऐसे हर सुबह-शाम,

जैसे दर्द को भी हरा दिया हो उसने।

 

अपने हिस्से की नींद कब की बाँट दी,

अपने हिस्से के सपने कहीं मोड़ दिए,

जो थी कभी अपनी पहचान की ज़िद,

अब बस “माँ” और “पत्नी” में समा गई है।

 

कोई शिकवा नहीं, कोई एहसान जताना नहीं,

बस चुपचाप ख़ुद को घर में ढाल दिया,

उसकी हर क़ुर्बानी में एक चुप्पी है,

जो कहती है, “तुम सब खुश रहो, बस यही काफ़ी है।”

 

पर हार नहीं मानी, ना शिकवा किया,

हर सुबह फिर से मुस्कुरा दिया,

बच्चों की टिफ़िन, स्कूल की तैयारी,

यही बन गई उसकी नई महारत सारी।

 

नए शहर की गलियाँ अब पहचानी लगती हैं,

जैसे धीरे-धीरे उसका नाम जान गईं हों,

सामान अभी भी डिब्बों में बंद कहीं,

पर उसने घर को घर बना ही दिया है।

 

पड़ोसन से हल्की सी बात-चीत,

सब्ज़ीवाले से पूछी हुई रोज़ की रीत,

यूँ ही धीरे-धीरे अपनापन बनता है,

अनजान शहर भी अपना लगने लगता है।

 

आईने में झलक अब जल्दी-जल्दी गुज़रती है,

बिंदी टेढ़ी है, पर मुस्कान सीधी,

दर्द को वो चेहरे पे आने नहीं देती,

सुबह फिर उठ जाती है, बिना शिकायत के।

 

रात को जब सब सो जाते हैं आख़िर,

वो अकेले बैठ के थोड़ा सुस्ताती है,

कमर सहलाती है, आँखें मूंदती है,

और चुपके से एक आह भर जाती है।

 

अभ्यांत सोता है उसकी बाहों में,

शिवेश खेलता है उसकी परछाई में,

दोनों की नींद में बसी है उसकी थकान,

और उसकी थकान में बसा है उनका जहान।

 

और वो, थककर भी, हर शाम खिलती है,

जैसे दिया बुझने से पहले ज़्यादा रोशन होता है,

घर सिर्फ़ ईंटों से नहीं बनता,

बनता है उसकी क़ुर्बानी और दर्द से।

 

एक दिन फिर से वो रसोई सजाएगी,

अपने हाथों का जादू फिर दिखाएगी,

तब तक बस इतना ही काफ़ी है,

कि वो घर को घर बनाए जा रही है।

 

वो चुपचाप एक घर को घर बनाती है,

और खुद, कहीं पीछे, धीरे-धीरे निखर जाती है।

 

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घर, जो उसने चुपचाप सँवारा — एक कविता, उसके नाम

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