Friday, April 24, 2020

"बेचारा पति "





बहुत दिनों बाद हमें एक सज्जन मिले,लग जाओ गले 
बोले यार इस बार तुम बड़े बदले हो,
पहले तो अच्छे थे, अब बड़े पतले हो,
क्या शादी हो गयी, या नौकरी नहीं है पास
सालियाँ बहुत है, या सर पे बैठी है सास ।

वे बोले यार पिछले जन्म में हमने 
क्या बुरे काम किये 
जो भगवान ने सारे दुःख 
हमारे नाम किये।

अच्छी नौकरी है, बीवी भी हंसी है ,
पर उनके पीछे एक लम्बी क़तर जमी है,
शुरू में तो था सभी कुछ भला 
पर लगता है नियति को 
यह सब नहीं खला ।

ये सब्जी कैसी उठा लाये, ये साड़ी कहा से लाये  
हमें तो माँ की याद आती है
हम तो मायके जायें 
 यही पर नहीं है समस्या खत्म
अभी तो आगे भी जारी है इनके सितम।

वो तो निराली है ,मत पूछो उनकी बात
जाती अकेली है ,लाती है मुसीबत साथ
 
इस बार जो बीवी मायके से आई 
आते ही बोली -जल्दी आओ बाहर
खड़ी है माँ जी 
हमारे पैरो क निचे से जमीन खिसक गई 
अब इस बार हमारी इनकम कट गई 

दौड़ के गए, देखा सास है खड़ी 
हाथों मैं लिए एक लम्बी छड़ी 
हम आदर सहित उनके चरणों में झुके 
बोली चालक को पैसे दो- बस  100 ही फुके 

हम सामान उठाते हुए बोले 
सासु माँ आप तो मस्त थी  
अब यह छड़ी कैसी ? पहले तो स्वस्थ थी 

माँ जी बोली -बेटा उम्र बीत रही है 
सफेदी कालीमा को जीत रही है 
बेटी से तो  मिल लिया पर 
देखा नहीं जवाई,मुझे तुम्हारी याद खिंच लाई

शाम को माँ जी बोली,बेटा 
जब ऑफिस जाओगे कल, तो लौटते 
हुए लेते आना फल 
अब तरकारी तो मुझे ,लगती नहीं अच्छी 
रात के खाने के लिए लेते आना मच्छी  

फिर सोच के बोली एक और बात 
हम झटपट बोले माँ जी हो गई रात  
आपको इतनी जल्दी क्यों मची है ?
अभी तो  पूरी सुबह बची है  

सुबह हुई तो साली जी की भी जागी ख्वाहिशे 
हमारे सामने रख दी अपनी फरमाहिशे 
बोली-जीजू सूट हो गया पुराना
प्लीज नया ले आना और 
आते  समय  मेरी  चप्पल भी जुड़ना 

बीवी भी कहा पीछे थी,
हमारा टेंशन और बड़ा दिया 
करेला तो पहले से था 
उसपे नीम चढ़ा दिया 

दौड़ के गेट पर छोड़ने आई 
बीवी बड़े प्यार से बोली 
सुनिय कल ऑफिस से जल्दी आ जाना 
सब पिक्चर साथ चलेंगे 
करना न  कोई बहाना

हम सब सुनते रहे,वो हमे सुनाते रहे 
ओले पढ़ते रहे,हम सर मुंडाते रहे 

पूरी तो करनी पड़ेगी 
ये साऱी बातें ,क्यूंकि 
मायके मैं बची है दो और सौगाते 
घर जा नहीं सकते खाली
नहीं तो बीवी ले आएगी एक और साली 

अब तुम ही बताओ भाई 
किस से  करे हम ये गीले 
भले ही लोग कुंवारे रह जाये 
किसी को ऐसी बीवी न मिले   .

PS; It is not my story, i am happy married and blessed with the beautiful family



Monday, April 13, 2020

सत्यप्रण



ओह । वो चेहरा 
काफी पुराना सा 
देखने में लगता है
जाना पहचाना सा ।

कुछ डरा-डरा सा , सहमा  हुआ
आँखों में पानी , मुँह से धुंआ
निकलने लगता है , जब बोलता है 
धारे बहते है, जब आँख खोलता है ।

किटकिटाते दांत, काँपता शरीर 
चीथड़ों में खड़ा हो, जैसे फ़क़ीर 

आँचल फैलता मेरे पास आया 
शायद       भीख        माँगने,
अन्देखा कर दिया मैंने उसे 
लगा       बगले       झाँकने ।

दबी आवाज में बोला,
करो मेरे दुखो का हरण 
इस अपाहिज को अपने 
यहाँ   दे   दो   शरण  ।

मैं भी उससे रोब से बोला 
ऐसे   कैसे   ले   लू   साथ  
क्या  नाम,  पता,  तुम्हारा 
और बताओ अपनी जात ।

प्रश्न  सुन  कर  वह  मुड़ा
और   बोला -   अच्छा   चलूँ 
मेरा अस्तित्व समाप्त हो रहा है 
शायद    फिर    न    मिलूं ।

मैं   भी   चिल्लाया  -  तुम  लोग 
फुटपाथ पर ही जीते हो, यही पर मरते हो 
कायर  हो,  झूठे  हो , चोर  हो 
तभी  इन  प्रश्नों  से  डरते  हो ।

बोला अगर मैने इन सवालों 
का जवाब दे दिया 
तो तुम भी वही करोगे 
जो सब ने किया  ।

मैंने उसे समझाया - हाथ की पाँचो उँगलियाँ
होती नहीं है एक सम
तुम अपनी व्यथा मुझे सुनाओ 
बोझ करो अपना यह कम   ।

सिसकता हुआ बोला 
जगाई  है तुमने मुझमे आस
तो सुनो - सत्य नाम है मेरा 
जात-पात का पता नहीं मेरे पास।

आज मैं इस दुनिया में 
हो    गया   हूँ   अनाथ 
कहीं मैं लुप्त न हो जाऊँ
ले  लो  मुझे  अपने  साथ ।

मैं कुछ सोच कर बोला 
मुझे तुम्हारा साथ न भाएगा
यह कलयुग है , मेरा तो 
जीना मुश्किल हो जायेगा ।

भाई। अब झूठ के बिना
दाल नहीं गलती 
झूठ का राज है 
सच की नहीं चलती।

अब तुम्हारे सामने 
बात हो गयी है साफ़ 
नहीं ले जा सकता मैं तुम्हे 
मुझको कर दो माफ़

फिर वही दरिद्र सा व्यक्ति 
चल पड़ा अंधेरे के ओर  
शायद खोजने उसको 
जिसके संग वो जा सके 
और इस कलयुग भरी दुनिया में 
जो कोई उसे अपना सके 

धन्यवाद ।




घर, जो उसने चुपचाप सँवारा — एक कविता, उसके नाम

                                घर बदला, दीवारें नई हैं, पर उसकी थकान वही पुरानी सी है, सुबह की चाय अब ठंडी होती है, बच्चों की हँसी मे...