Monday, April 13, 2020

सत्यप्रण



ओह । वो चेहरा 
काफी पुराना सा 
देखने में लगता है
जाना पहचाना सा ।

कुछ डरा-डरा सा , सहमा  हुआ
आँखों में पानी , मुँह से धुंआ
निकलने लगता है , जब बोलता है 
धारे बहते है, जब आँख खोलता है ।

किटकिटाते दांत, काँपता शरीर 
चीथड़ों में खड़ा हो, जैसे फ़क़ीर 

आँचल फैलता मेरे पास आया 
शायद       भीख        माँगने,
अन्देखा कर दिया मैंने उसे 
लगा       बगले       झाँकने ।

दबी आवाज में बोला,
करो मेरे दुखो का हरण 
इस अपाहिज को अपने 
यहाँ   दे   दो   शरण  ।

मैं भी उससे रोब से बोला 
ऐसे   कैसे   ले   लू   साथ  
क्या  नाम,  पता,  तुम्हारा 
और बताओ अपनी जात ।

प्रश्न  सुन  कर  वह  मुड़ा
और   बोला -   अच्छा   चलूँ 
मेरा अस्तित्व समाप्त हो रहा है 
शायद    फिर    न    मिलूं ।

मैं   भी   चिल्लाया  -  तुम  लोग 
फुटपाथ पर ही जीते हो, यही पर मरते हो 
कायर  हो,  झूठे  हो , चोर  हो 
तभी  इन  प्रश्नों  से  डरते  हो ।

बोला अगर मैने इन सवालों 
का जवाब दे दिया 
तो तुम भी वही करोगे 
जो सब ने किया  ।

मैंने उसे समझाया - हाथ की पाँचो उँगलियाँ
होती नहीं है एक सम
तुम अपनी व्यथा मुझे सुनाओ 
बोझ करो अपना यह कम   ।

सिसकता हुआ बोला 
जगाई  है तुमने मुझमे आस
तो सुनो - सत्य नाम है मेरा 
जात-पात का पता नहीं मेरे पास।

आज मैं इस दुनिया में 
हो    गया   हूँ   अनाथ 
कहीं मैं लुप्त न हो जाऊँ
ले  लो  मुझे  अपने  साथ ।

मैं कुछ सोच कर बोला 
मुझे तुम्हारा साथ न भाएगा
यह कलयुग है , मेरा तो 
जीना मुश्किल हो जायेगा ।

भाई। अब झूठ के बिना
दाल नहीं गलती 
झूठ का राज है 
सच की नहीं चलती।

अब तुम्हारे सामने 
बात हो गयी है साफ़ 
नहीं ले जा सकता मैं तुम्हे 
मुझको कर दो माफ़

फिर वही दरिद्र सा व्यक्ति 
चल पड़ा अंधेरे के ओर  
शायद खोजने उसको 
जिसके संग वो जा सके 
और इस कलयुग भरी दुनिया में 
जो कोई उसे अपना सके 

धन्यवाद ।




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